जींद : आवश्यक वस्तु अधिनियम में परिवर्तन से जमाखोरी एवं कालाबाज़ारी बढ़ेगी : सतीश जैन

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  • आवश्यक वस्तु अधिनियम में परिवर्तन से जमाखोरी एवं कालाबाज़ारी बढ़ेगी : सतीश जैन
  • अधिनियम में न्यूनतम खरीद मूल्य “लागत+50℅” का वर्णन होना चाहिए

राजेंद्र भारद्वाज। जींद


आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन करके अनाज, तेल, आलू, प्याज आदि को इस अधिनियम के दायरे से बाहर करने की केंद्र सरकार की घिनोनी हरकत को किसान, उपभोगता एवं आम जनता के लिए घातक करार देते हुए इनैलो व्यपार मंडल के प्रदेशाध्यक्ष सतीश जैन ने कहा कि अगर यह अध्यादेश किसानों के हित में है तो बीजेपी सरकार खुले मंच पर खुली बहस स्वीकार करे। इस संशोधन का फायदा सिर्फ और सिर्फ अम्बानी,अडानी जैसे बड़े उद्योगपतियों और जमाखोरों को होगा। किसान को तो इसका नुकसान ही होगा क्योंकि किसान के पास न तो फसल संभालने की क्षमता है ओर न ही उपज भंडारण की सुविधा। उसे तो फसल आते ही तुरन्त पैसों की जरूरत होती है ताकि अपने रोजमर्रा के खर्च चला सके, लिए हुए कर्ज उत्तार सके और अपना एवं परिवार का पालन-पोषण कर सके। मूल अधिनियम की प्रस्तावना में इसका उद्देश्य वर्णन है कि कतिपय वस्तुओं के उत्पादन, प्रदाय और वितरण तथा उनमें व्यापार और वाणिज्य के नियंत्रण के लिए जनसाधारण के हित में उपबन्ध करने के लिए यह अधिनियम बनाया गया था। इस अधिनियम की धारा 2(4) के उपबन्धों अनुसार केन्द्रीय सरकार, यदि उसको यह समाधान हो जाता है कि लोकहित में और उन कारणों से जो राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएंगे ऐसा करना आवश्यक है तो राज्य सरकारों के परामर्श से उक्त सूची में नई वस्तुओ को जोड़ या निकाल सकेगी। स्पष्ट है कि इसमें राज्य सरकारों से परामर्श जरूरी है। भविष्य में इस अधिनियम का सबसे बुरा प्रभाव आम जनता और उत्पाद के अंतिम उपभोगता पर भी पड़ेगा क्योकि बड़े-बड़े उद्योगपति व सरमायेदार किसान की मजबूरी का फायदा उठा कर कृषि उपज सस्ती खरीदकर उसका भंडारण कर लेंगे। क्योंकि उनके पास वित्तीय क्षमता भी है और भंडारण सुविधा भी। भंडार की गई उपज को फिर वो मनमाने दाम पर बाज़ार में बेचेंगे क्योकि संशोधित अधिनियम के प्रावधानों अनुसार भंडारण पर कोई रोक नही होगी। इससे उत्पाद का अंतिम उपभोगता भी पिसेगा, उसे उच्च कीमतों पर उत्पाद मिलेगा।कालाबाज़ारी और जमाखोरी को बढ़ावा तो मिलेगा ही जिसके परिणामस्वरूप 5 रुपये किलो वाला प्याज 500 रुपये किलो भी बिकेगा। अधिनियम में कहीं भी न्यूनतम खरीद मूल्य का वर्णन नही है जिससे किसान को उसकी फसल की सही कीमत, वजन एवं बिक्री की गारंटी नही है। सरकारी पक्ष दावा कर रहे हैं कि इससे न्यूनतम खरीद मूल्य खत्म नही होगा, वह पुरानी व्यवस्था अनुसार जारी रहेगा, यह सिर्फ जुबानी बातें हैं। सरकार की मंशा एवं नीयत यदि साफ व स्पष्ट है तो अधिनियम में लागत+50℅ से न्यूनतम खरीद मूल्य को उपबन्धित कर दे। मुठ्ठीभर कम्पनियां व्यपारिक गठबंधन करके उपज खरीदेंगी तो गरीब-मजबूर किसान की मूल्य निर्धारण,वजन एवं कीमत की मोलभाव की शक्ति खत्म हो जाएगी और स्वभाविक तोर पर नुकसान किसान को ही होगा। केंद्र सरकार अमेरिका, कनाडा जैसे विकसित देशों की नकल तो करना चाह रही है लेकिन यह नही देख रही कि उन देशों का किसान समृद्ध, अमीर एवं क्षमतावान है जबकि भारतीय किसान मजबूर,गरीब,करजाई और क्षमताहीन है। पंजाब सरकार ने विधानसभा में प्रस्ताव पारित करके प्रदेश में इस कानून के लागू होने पर रोक लगा दी है, हरियाणा सरकार को भी तुरन्त ऐसी ही कार्यवाही करनी चाहिए। केंद्र सरकार को भी हठधर्मिता छोड़कर किसान एवं आमजन विरोधी तीनो अध्यादेश या तो वापिस लेने चाहिए या फिर किसानों के हित मे किसान संगठनों एवं विपक्षी दलों से परामर्श करके इस अधिनियम में आवश्यक परिवर्तन करने चाहिए ताकि अधिनियम का मूल उद्देश्य “किसान एवं जनहित” पूरा हो सके।

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